Wednesday, September 3, 2025

सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'

 सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'



क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया

फ़िराक़ गोरखपुरी बेमिसाल शायर थे। और उससे भी ज़्यादा मशहूर थी उनकी हाज़िर-जवाबी, उनका अक्खड़पन। एक ऐसा नायाब शायर जो खुद के बारे में ये बात कह पाया: 

 आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअसरो

 जब भी उनको ध्यान आएगा, तुमने फ़िराक़ को देखा है

एक बार फ़िराक़ गोरखपुरी एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे। उनसे पहले तमाम अलग अलग शायरों से पढवाया गया। फ़िराक़ ऊबते रहे, इस सबके बावजूद वो धीरज से अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। आखिरकार लम्बे इंतज़ार के बाद उनकी बारी आई, वो उठे और माइक पर गए, अब बारी थी गोला दाग़ने की। उन्होंने कहा, 

"हज़रात! अब तक आप कव्वाली सुन रहे थे. अब कुछ शेर सुन लीजिए"

एक बार इलाहाबाद में कोई मुशायरा हो रहा था। यहाँ भी तमाम शायरों से पढ़वाया जाता रहा। जब फ़िराक़ साहब ग़ज़ल पढ़ने के लिए खड़े हुए तो लोग हंसने लगे। लोगों को हँसते देखकर वो भड़क गए और कह उठे, "लगता है आज मूंगफली बेचने वालों ने अपनी औलादों को मुशायरा सुनने को भेज दिया है"

ऐसा था फ़िराक़ का गुस्सा। 

हालांकि बाद में स्टेज पर बैठे शायरों ने नोट किया कि फ़िराक़ की शेरवानी के नीचे से उनका नाड़ा लटक रहा है।  कैफ़ी आज़मी उठे। उनकी शेरवानी उठाकर नाड़ा उनकी कमर में खोंस दिया। लोग हंस पड़े। लेकिन फ़िराक़ ने जब अपनी ग़ज़ल सुनाई तो सब वाह वाह कर उठे। 

जैसा कि हमने कहा फ़िराक़ बहुत अक्खड़ थे, वो अक्सर कहा करते थे,

"हिंदुस्तान में सही अंग्रेज़ी सिर्फ ढाई लोगों को आती है। एक मैं, एक सर्वपल्ली राधाकृष्णन और आधा जवाहरलाल नेहरू"

सन 1948  की बात है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फ़िराक़ को 'आनंद भवन' में मिलने के लिए बुलाया। जब रिसेप्शनिस्ट ने उनका नाम पूछकर बैठने को कहा तो फ़िराक़ को अच्छा नहीं लगा। इसी घर में वो चार साल जवाहरलाल के साथ रहे थे। जवाहरलाल प्रधानमंत्री बन गए तो क्या उन्हें इंतजार करना होगा? फिराक ने अपना नाम बताया रघुपति सहाय, रिसेप्शनिस्ट ने कागज की एक पर्ची पर 'आर. सहाय'  लिखा और अंदर भेज दिया। फिराक लम्बे समय तक इंतज़ार करते रहे। फिर उनका पारा चढ़ गया। वो चिल्लाये,  'मैं यहां इंतजार करने नहीं आया हूँ। आज तक मुझे इस घर में आने से कभी नहीं रोका गया। कह देना जवाहरलाल से कि मैं 8/4 बैंक रोड पर रहता हूँ। और वो वहां से निकल पड़े।  

शोर सुनके नेहरू जल्दी से बाहर आए और बोले, 'अरे रघुपति, तुम यहाँ क्यों खड़े हो? तुम्हें घर पता है। तुम्हें सीधे अंदर आना चाहिए था।' उन्होंने फ़िराक को गले लगा लिया। जब फिराक ने उन्हें बताया कि काफी देर पहले रिसेप्शनिस्ट ने उनके नाम की पर्ची अंदर भेजी थी, तो नेहरू ने जवाब दिया, 'भाई, तीस साल से मैं तुम्हें रघुपति के रूप में जानता हूँ। यह आर. सहाय कौन हो गया? इसके बाद नेहरू उन्हें अंदर ले गए और देर तक बातें की। चानक फ़िराक़ चुप हो गए। नेहरू ने पूछा,  “अभी तक तुम गुस्से में हो क्या”?

फ़िराक़ ने मुस्कुरा कर जवाब दिया--

तुम मुखातिब भी हो, करीब भी

तुमको देखें कि तुमसे बात करें। 

आज फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्मदिन है। उनकी याद को हमारा सलाम। 

ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त

सोच लें और उदास हो जाएँ

--यूनुस ख़ान 

#FiraqGorakhpuri

#फ़िराक़गोरखपुरी

Wednesday, August 13, 2025

युनुस खान — विविध भारती

 🎙️ **युनुस खान — विविध भारती की आवाज़ जो दिलों तक पहुँची** 🇮🇳 अगर रेडियो की दुनिया में किसी ने शब्दों को जादू बना दिया, तो वो हैं **युनुस खान**।  



"विविध भारती" के मंच से उन्होंने न सिर्फ गीतों की मिठास बाँटी, बल्कि कहानियों, किस्सों और कलाकारों की विरासत को भी जीवंत किया।


📻 **मुख्य योगदान**:

- 20+ वर्षों से विविध भारती के साथ जुड़े रहे  

- "सेहतनामा", "संगीत सरिता", "जयमाला", "सप्ताहिकी" जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों की मेज़बानी  

- सैकड़ों कलाकारों के इंटरव्यू लिए — जिनमें लता मंगेशकर से लेकर गुलज़ार तक शामिल हैं  

- श्रोताओं से जुड़ने की उनकी शैली ने उन्हें हर उम्र के दिलों में जगह दी


🧠 **उनकी शैली की खासियत**:

- भावनात्मक जुड़ाव के साथ तथ्यात्मक प्रस्तुति  

- हिंदी भाषा की गरिमा और सरलता का अद्भुत संतुलन  

- हर एपिसोड में एक नया अनुभव — एक नई यात्रा


🙏 **युनुस खान का योगदान सिर्फ रेडियो तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक संवाद को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।**


📸 *उनकी आवाज़ में वो गर्माहट थी, जो घर के कोने में रखे ट्रांजिस्टर को भी परिवार का हिस्सा बना देती थी।*


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Saturday, June 7, 2025

Urdu nazm

 हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं 

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं 


बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं 

तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं 


मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं 

मुझ को जगा दिया यही एहसान कम नहीं 


या रब हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअ'तें 

दामन तो क्या अभी मिरी आँखें भी नम नहीं 


शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन 

तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं 


अब इश्क़ उस मक़ाम पे है जुस्तुजू-नवर्द 

साया नहीं जहाँ कोई नक़्श-ए-क़दम नहीं 


मिलता है क्यूँ मज़ा सितम-ए-रोज़गार में 

तेरा करम भी ख़ुद जो शरीक-ए-सितम नहीं 


मर्ग-ए-'जिगर' पे क्यूँ तिरी आँखें हैं अश्क-रेज़ 

इक सानेहा सही मगर इतना अहम नहीं 


          ©  जिगर मुरादाबादी

Sunday, May 25, 2025

 


सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'

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