Tuesday, December 22, 2020

#Standwithfarmers

 ⛈️बरसात का मौसम था ।

 नंदप्रयाग के आगे लंबा जाम लगा था । भूस्खलन हुआ था काफ़ी देर गाड़ी में बैठा रहा । फिर बहुत बोर हो गया तो सोचा चलकर देखा जाए ।

बहुत आगे था वो स्थल । देखा तो एक जीप के बराबर की बड़ी चट्टान सड़क के बीचोबीच आ गिरी थी ।

दो चार सौ लोग तमाशबीन थे । jcb के बस का भी नहीं था । बस इंतज़ार हो रहा था कि ग्रेफ की टीम आए और ब्लास्ट से पत्थर उड़ा दिया जाए। 

लोगों को दूर जाना था , शाम होते ही दिक्कत हो जाती । इतने में हेमकुंड जाने वाले सिक्ख भी वहां देखने को आ गए और आपस में गुफ्तगू होने लगी । सभी लोग हाथ बांधे खड़े थे । करीब पचास की संख्या में सिक्ख इक्कट्ठे हुए और पत्थर को ठेलकर किनारे या नीचे खाई में धकेलने को बाहें कसने लगे जबकि दो सौ के करीब लोग मूकदर्शक बनी रहे । सिक्खों में नौजवानों के अलावा अधेड़ और 70 साल बूढ़े भी थे ।

पजामा ऊपर करके मिट्टी में सने हुए पांव जमा कर बोले सो निहाल का गगनभेदी नारा लगाकर पत्थर को धकेलने की जीतोड़ कोशिश की गई किन्तु पत्थर टस से मस न हुआ ।

करीब तीन चार कोशिश के बाद सिक्खों को लगा कि वे धकेलना तो दूर इंच भर हिला भी नहीं पाएंगे । मिट्टी में लिपटे हुए कपड़ों के साथ सभी सिक्ख अपने अपने वाहनों में चले गए ।

लोगों में सुगबुगाहट थी । कुछेक ने ये भी कहा कि हमें तो पहले ही पता था कि हिलेगा भी नहीं ।

इतने में एक काली टोपी पहने गढ़वाली बुजुर्ग ऊंचे स्वर में बोले । कि सलाम है भई सिक्खों को । इनका जज़्बा और हिम्मत देखिये । आप सब तमाशा लगाकर खड़े थे कि कपड़े गंदे न हो जाएं?

अरे आप भी सब मिलकर हाथ लगाते तो चट्टान हट जाती ।

बहरहाल विस्फोट से चट्टान हटा दी गई ।

आज के आंदोलनो में भी वही चट्टान जैसा कुछ है ।

आप सब तमाशबीन न बने रहें । लगाइए हाथ , उठाइये हाथ 

ये देश के भविष्य का सवाल है , धकेल दीजिये सब मिलकर इस चट्टान को खाई में ।

याद रखिये ययहाँ कोई विस्फोट नहीं होने वाला ।

मिलजुल कर संघर्ष करके ही लड़ाई जीती जाएगी।

Ajit Sahni

सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'

 सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़' क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया फ़िराक़ गोरखपुरी बेमिसाल शायर थे। और उससे भी ज़्या...