Thursday, January 7, 2021

Ghazal

 क़तरा अब एहतिजाज करे भी तो क्या मिले

दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले


हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ

फिर यह भी चाहता है उसे रास्ता मिले


इस आरज़ू ने और तमाशा बना दिया

जो भी मिले हमारी तरफ देखता मिले


दुनिया को दूसरों की नज़र से न देखिये

चेहरे न पढ़ सके तो किताबों में क्या मिले


रिश्तों को बार बार समझने की आरज़ू

कहती है फिर मिले तो कोई बेवफ़ा मिले


इस दौर-ए-मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं ‘वसीम’

जिस शख्स की ख़ता हो उसी को सज़ा मिले


*वसीम बरेलवी*

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