*असहमति की आवाजों के ख़िलाफ़*
*उभरता दंगाजीवी वर्ग*
*पूँजीपशुजीवी और दंगाजीवियों का यह गैंग हमेशा ही मेहनतकश आन्दोलनजीवियों के ख़िलाफ़ रहा है । यह कोई नई बात नहीं है । आज़ादी के आंदोलन में भी इन्होंने आन्दोलनजीवी देशभक्तों और क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ ही काम किया । अंबेडकर, सुभाष, भगतसिंह जैसे प्रगतिशील क्रांतिकारियों के आंदोलन के भी ये हमेशा ख़िलाफ़ ही रहे और इतना ही नहीं गांधीजी को गोली भी इन्हीं हिंसक लोगों ने गोली मारी । आज अहिंसा का सबसे ज़्यादा शोर मचाते हुए यही दंगाजीवी पाए जाते हैं । वे खुद दंगा करते-कराते ही सत्ता तक पहुंचे हैं । स्थिति इतनी ख़राब हो चुकी है कि आंदोलनकारियों को हर वक्त यह चिंता लगी रहती है कि कहीं सरकार उनके आंदोलन में दंगा न करा दे । इन्होंने संसद को भी श्रमजीवियों और असहमतियों के ख़िलाफ़ काम करने वाली संस्था में तब्दील कर दिया है और पिछले सात वर्षों में काम इन्होंने धेले का नहीं किया बल्कि हमारे पूर्वजों द्वारा अपने खून-पसीने से खड़े किए गए व्यवसायिक संस्थानों तक को भी इन्होंने बेच खाया । उपलब्धियों के नाम पर इन दंगाजीवियों की यही एकमात्र खुराफ़ात रही है ।*